भगवान का वांगमय स्वरूप है श्रीमद्भागवत महापुराण: दिव्य मोरारी बापू

Shivam
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Puskar/Rajasthanपरम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, श्रीमद्भागवत महापुराण सत्य स्वरूप है। भगवान श्रीराधा-कृष्ण और भागवत महापुराण में रंच मात्र अंतर नहीं है। जो पुण्य फल भगवान के दर्शन, श्रवण, पूजन से प्राप्त होता है, वही पुण्य फल भागवत के दर्शन पूजन श्रवण से प्राप्त होता है। श्रीमद्भागवत महापुराण भगवान का वांगमय स्वरूप है।
वांगमय का अर्थ शास्त्र से है, भागवत भगवान का शास्त्रमय विग्रह है। मंदिर के अंदर भगवान का जो विग्रह दर्शन होता है, वह अर्चा विग्रह है, उसकी हम पूजा करते हैं। लेकिन श्रीमद्भागवत महापुराण अथवा धर्मशास्त्र भगवान का चर्चा विग्रह है। इसमें भगवान का गुणसंकीर्तन, नामसंकीर्तन, लीलासंकीर्तन का निरूपण किया गया है। अतः इसे चर्चा विग्रह कहते हैं। धर्म शास्त्रों का चिंतन, मनन, श्रवण, पठन, पाठन किया जाता है। सत्संग भी भगवान की आराधना है।
चार घंटे अगर नित्य प्रति सत्संग हो रहा है, तो चार घंटे भगवान की पूजा हो रही है।वक्ता के द्वारा भगवान का गुणगान करके, पूजन किया जा रहा है और श्रोता के द्वारा भगवान की कथा का श्रवण करके भगवान का पूजन किया जा रहा है। श्रीमद्भागवत महापुराण के श्रवण से भय समाप्त हो जाता है। भगवान के प्रति भाव जगता है, और संसार का भय समाप्त होता है। संत कहते हैं- भाव जागे भय भागे।
भागवत के श्रवण, गान से भक्ति, ज्ञान, वैराग्य की वृद्धि होती है। भगवान प्रसन्न होते हैं। इसलिए भागवत का बड़ी सावधानी से श्रवण, गान करना चाहिए। सभी हरि भक्तों को तीर्थगुरु पुष्कर आश्रम एवं साक्षात् गोलोकधाम गोवर्धन आश्रम के साधु-संतों की तरफ से शुभ मंगल कामना। श्रीदिव्य घनश्याम धाम श्रीगोवर्धन धाम कॉलोनी बड़ी परिक्रमा मार्ग, दानघाटी, गोवर्धन, जिला-मथुरा, (उत्तर-प्रदेश) श्रीदिव्य मोरारी बापू धाम सेवाट्रस्ट, ग्रा.पो.-गनाहेड़ा पुष्कर जिला-अजमेर (राजस्थान)
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