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त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय विधेयक 2025 को संसद ने पारित कर दिया. इस विधेयक को पहले लोकसभा ने मंजूरी दी थी और अब राज्यसभा ने भी इसे स्वीकृति प्रदान की है. विधेयक के तहत गुजरात के आनंद स्थित ग्रामीण प्रबंधन संस्थान को त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय के रूप में स्थापित किया जाएगा और इसे राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित किया जाएगा. यह विश्वविद्यालय सहकारी क्षेत्र में उच्च तकनीकी और प्रबंधन शिक्षा के साथ-साथ प्रशिक्षण भी प्रदान करेगा. इसके माध्यम से सहकारी अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाएगा, ताकि सहकार से समृद्धि की दिशा में वैश्विक मानकों को प्राप्त किया जा सके.
इसके अलावा इस विश्वविद्यालय को देश में सहकारी आंदोलन को और मजबूत करने के लिए एक नेटवर्क स्थापित करने का उद्देश्य है. विधेयक पर चर्चा करते हुए सहकारिता राज्य मंत्री मुरलीधर मोहोल (Murlidhar Mohol) ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने सहकारी क्षेत्र को एक नई दिशा देने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं. उन्होंने कहा कि प्राथमिक कृषि ऋण सोसायटी (पीएसीएस) को सशक्त बनाया गया है और इसे बहुउद्देशीय बनाने के लिए कदम उठाए गए हैं. इसके अलावा अगले 5 वर्षों में पीएसीएस की संख्या को एक लाख से बढ़ाकर 3 लाख करने का लक्ष्य रखा गया है.
मंत्री ने आगे कहा, भारत को 2047 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने के लिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सहकारी क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान होगा. उन्होंने बताया कि वर्तमान में देश में आठ लाख से अधिक सहकारी संस्थाएं कार्यरत हैं जिनसे 30 करोड़ से अधिक लोग जुड़े हुए हैं. यह आंकड़ा इस बात को स्पष्ट करता है कि लगभग हर किसान परिवार का एक सदस्य सहकारी समितियों से जुड़ा हुआ है. मुरलीधर मोहोल ने यह भी बताया कि 2013-14 में यूपीए सरकार के दौरान सहकारिता मंत्रालय का बजट केवल 122 करोड़ रुपये था, जबकि नरेंद्र मोदी सरकार के तहत इसे बढ़ाकर 1,190 करोड़ रुपये कर दिया गया है. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि सरकार ने सहकारी क्षेत्र के लिए कई योजनाओं को लागू किया है और इसे और मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं.
कांग्रेस के दिग्विजय सिंह ने विधेयक पर चर्चा करते हुए सरकार पर सहकारिता के निगमीकरण का आरोप लगाया. उन्होंने यह भी कहा कि संविधान में यह प्रावधान है कि हर पांच साल में सहकारी समितियों के चुनाव होने चाहिए, लेकिन कई राज्यों में इसका पालन नहीं किया जा रहा. वहीं, भाजपा की इंदु बाला गोस्वामी ने सहकारी समितियों के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि यह केवल लाभ कमाने का एक साधन नहीं है, बल्कि यह मानवता के विकास का मार्ग भी है. आम आदमी पार्टी के अशोक कुमार मित्तल ने भी इस विधेयक का समर्थन करते हुए कहा, आनंद संस्थान का राष्ट्रीय महत्व का दर्जा देना स्वागत योग्य कदम है. वहीं बीजेडी के सुभाशीष खुंटिया ने विधेयक के कुछ खंडों पर आपत्ति जताते हुए इसे केंद्रीकरण की दिशा में एक कदम बताया.
वाईएसआरसीपी के अयोध्या रामी रेड्डी अल्ला ने कहा कि यह विधेयक सहकारी शिक्षा को मजबूत करने के लिए महत्वपूर्ण कदम है और यह सहकारी क्षेत्र में शिक्षा, प्रशिक्षण और अनुसंधान कार्यों के विकास में मदद करेगा. उन्होंने यह भी कहा कि त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय सहकारी क्षेत्र में उत्कृष्टता केंद्र बनकर डिग्री और स्नातकोत्तर डिग्री के कार्यक्रमों के साथ-साथ कई पाठ्यक्रम प्रदान करेगा. विधेयक को लेकर सदन में विस्तृत चर्चा हुई जिसमें विभिन्न दलों के सदस्यों ने अपने विचार साझा किए. इसके बाद सदन की कार्यवाही कल सुबह 11 बजे फिर से शुरू करने के लिए स्थगित कर दी गई. अंत में कहा जा सकता है कि यह विधेयक सहकारी क्षेत्र को मजबूत करने और शिक्षा तथा अनुसंधान के माध्यम से इसका विस्तार करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है.