Pakistan News: बजट में कटौती से पाकिस्तानी युवाओं को लगा बड़ा झटका, बलूचिस्तान में भारी विरोध

Shubham Tiwari
Sub Editor The Printlines (Part of Bharat Express News Network)

Pakistan News: आर्थिक तंगी से जूझ रहे पाकिस्तान की हालत आए दिन और बिगड़ती ही जा रही है. महंगाई के चलते यहां की जनता सड़क पर उतर आई है. लोग दाने-दाने को मोहताज हैं. यहां कि आम जनता 2024-25 के वित्तीय बजट की कड़ी निंदा कर रही है. वहीं, अब इन सबके बीच पाकिस्तान के सबसे बड़े प्रांत बलूचिस्तान के युवा पाकिस्तान सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं. आइए जानते हैं क्या है पूरा मामला…

सड़कों पर पाकिस्तान के युवा…

दरअसल, पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत बलूचिस्तान है. यहां के युवा सड़कों पर हैं. यहां के बलोच छात्र संगठन का आरोप है कि पाकिस्तान सरकार उसके अधिकार को कुचलने की कोशिश कर रही है. बलूच छात्र संगठन (BSO) ने दावा किया है कि स्थानीय प्रशासन ने बालोची और ब्राहवी साहित्य स्कूलों के बजट में 70 से 90 प्रतिशत की कटौती की है, जबकि अन्य का बजट पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया है.

BSO ने की ये मांग

बलोच छात्र संगठन (BSO) ने आरोप लगाया है कि पाकिस्तान सरकार हससे हमारा अधिकार छीनने की कोशिश कर रहा है. द बलूचिस्तान पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, बलोच छात्र संगठन ने इसको लेकर क्वेटा प्रेस क्लब में एक प्रेस वार्ता की. इस दौरान उसने साहित्यिक संगठन के बजट में कटौती को रद्द करने की मांग की. छात्र संगठन ने कहा कि अगर उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं तो जबरदस्त विरोध प्रदर्शन होगा.

BSO के ये नेता आएं आगे

ज्ञात हो कि पाकिस्तान सरकार द्वारा जारी वित्तीय बजट में कटौती से बलूचिस्तान अकादमी केच, बलूची अकादमी क्वेटा और इज्जत अकादमी पंजगुर जैसे प्रांत के कई संगठनों को बड़ा झटका लगा है. बलोच छात्र संगठन के जनरल सेक्रेटरी समद बलूच, बीएसओ के सूचना सचिव शकूर बलूच और अन्य नेताओं ने इस मुद्दे को जबरदस्त तरीके से उठाया है. इन नेताओं का कहना है कि सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने के लिए मातृभाषाओं का अस्तित्व महत्वपूर्ण है.

BSO ने लगाया ये आरोप

बीएसओ ने पाकिस्तान सरकार पर आरोप लगाते हुए आगे कहा कि उसे अन्य साहित्यिक संगठनों और उनके बजटीय आवंटन से कोई दिकक्त नहीं है, लेकिन बलूची भाषा वाले स्कूलों के बजट में जो कटौती की गई है, उससे भाषाई पक्षपात के अलावा कुछ नहीं है. बीएसओ महासचिव ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड जैसे अग्रणी देश अपनी मातृभाषा को अधिक प्राथमिकता देते हैं. वे अपने बच्चों को अपनी मूल भाषाओं का इस्तेमाल करके शिक्षित करते हैं लेकिन हमारी संस्कृतियों और भाषाओं को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है.

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